ABOUT VAYANA
भगवान महावीर के निर्वाण के बाद उनके उपदेश मौखिक परंपरा से संरक्षित रहे। भगवान महावीर स्वामी के उपदेशों को उनके गणधर शिष्यों ने सूत्र रूप में गूंथा और वह गूंथा हुआ ज्ञान उन्होनें सूत्र और अर्थ रूप से अपने शिष्यों को वाचना के द्वारा प्रदान किया। वाचना की यह परंपरा बहुत लम्बे समय तक चलती रही। आचार्य भद्रबाहुस्वामी के पश्चात् श्रुत की धारा क्षीण होने लगी। जब आचार्यों ने देखा कि काल के प्रभाव से स्मृति का ह्रास हो रहा है और स्मृति का ह्रास होने से ज्ञान का ह्रास हो रहा है, तब जैनाचार्यों ने एकत्रित होकर वाचना के माध्यम से श्रुतज्ञान को व्यवस्थित किया। इस प्रकार श्रुत को व्यवस्थित करने के लिए पाँच वाचनाएँ हुई। इन वाचनाओं के माध्यम से जैन ग्रंथों को संकलित किया गया और उनका अस्तित्व सुनिश्चित किया गया।
प्रथम वाचना
वीर निर्वाण १६० के आसपास जैन-संघ को भयंकर दुष्काल से जूझना पड़ा। जिससे समस्त श्रमण-संघ छिन्न-भिन्न हो गया। दुर्भिक्ष के कारण साधु आहार की तलाश में सुदूर देशों की ओर चले गये। दुष्काल समाप्त होने पर विच्छिन्न श्रुत को संकलित करने के लिए श्रमणसंघ आचार्य स्थूलिभद्र के नेतृत्व में एकत्रित हुआ। पाटलिपुत्र में प्रथम बार श्रुत-ज्ञान को व्यवस्थित करने का प्रयास किया गया। जिससे इसे ‘पाटलिपुत्र वाचना’ नाम दिया गया। यहाँ एकत्रित श्रमणसंघ ने परस्पर विचार संकलन कर ग्यारह अंग संकलित किये। बाहरवें अंग दृष्टिवाद का ज्ञान किसी को नहीं था। उस समय दृष्टिवाद के ज्ञाता सिर्फ भद्रबाहु ही थे, जो नेपाल की गिरि-कंदराओं में महाप्राण नामक ध्यान की साधना कर रहे थे। उनसे दृष्टिवाद का ज्ञान लेने के लिए श्रमणसंघ नेपाल में भद्रबाहु की सेवा में उपस्थित हुआ और दृष्टिवाद की वाचना देने का निवेदन किया परन्तु भद्रबाहु ने आचार्य होते हुए भी संघ के दायित्व से उदासीन होकर कहा— “मेरा आयुष्य अल्प समय का है जिससे मैं वाचना देने में असमर्थ हैं।”
इससे श्रमणसंघ क्षुब्ध हो उठा और यह कहकर लौट आया कि संघ की प्रार्थना अस्वीकार करने से आपको प्रायश्चित्त लेना होगा। पुनः एक श्रमणसंघाटक ने भद्रबाहु के पास आकर निवेदन कर संघ की प्रार्थना दोहराई तो भद्रबाहु एक अपवाद के साथ वाचना देने को तैयार हुए, “कि वाचना मंदगति से अपने समयानुसार प्रदान करेंगे”। इस पर स्थूलिभद्र आदि ५०० शिक्षार्थियों को नेपाल भेजा गया। भद्रबाहुस्वामि का वाचना प्रदान करने का क्रम बहुत मंद गति से होने के कारण मुनियों का धैर्य टूट गया। ४९९ शिष्य वाचना को बीच में ही छोड़कर चले गये, परन्तु स्थूलभद्र निष्ठा से अध्ययन में लगे रहे और दश पूर्वों का अध्ययन कर लिया। तब तक भद्रबाहुस्वामि का साधनाकाल पूर्ण हो जाने से भद्रबाहु पाटलिपुत्र आये। वहाँ यक्षा आदि साध्वियाँ स्थूलीभद्र के दर्शनार्थ आयी, वहीं पर स्थूलभद्र ने सिंह का रूप धारण करके चमत्कार दिखाया। यह बात भद्रबाहु को ज्ञात होते ही आगे वाचना देना बंद कर दिया और कहा कि ज्ञान का अहंकार विकास में बाधक है। स्थूलिभद्र द्वारा क्षमा माँगने व अत्यधिक अनुनय-विनय करने पर शेष चार पूर्वों की वाचना केवल सूत्र रूप में प्रदान की अर्थ में नहीं, इस प्रकार पाटलिपुत्र वाचना में दृष्टिवाद सहित अंग साहित्य को ही व्यवस्थित करने का प्रयत्न हुआ.
द्वितीय वाचना
आगम संकलन हेतु दूसरी वाचना ईस्वी पूर्व द्वितीय शताब्दी अर्थात् वीर निर्वाण ३०० से ३३० के मध्य में हुई। उड़ीसा के सम्राट खारवेल थे, जो जैन धर्म के उपासक थे। उन्होंने उड़ीसा के कुमारी-पर्वत पर जैन मुनियों का सम्मेलन बुलाकर मौर्यकाल में जो अंग विस्मृत हो गये थे, उन्हें संकलित करवाया। इस वाचना के प्रमुख आचार्य सुस्थित व सुप्रतिबुद्ध थे, ये दोनों सहोदर थे। उस युग तक आगमों के अध्ययन अध्यापन की परंपरा गुरु-शिष्य के माध्यम से मौखिक रुप में ही चलती थी। खंडगिरि और उदयगिरि में स्थित शिलालेखों से यह स्पष्ट होता है कि इस सम्मेलन का उद्देश्य आगम संकलन था।
तृतीय वाचना
आगम संकलन का तीसरा प्रयत्न वीर निवार्ण के 827 और 840 के बीच हुआ। प्रथम आगम वाचना में जो ग्यारह अंग संकलित किये गये, वे गुरु-शिष्य क्रम से शताब्दियों तक चलते रहे। फिर बारह वर्षों का भयानक दुर्भिक्ष पडा, जिससे अनेक जैन श्रमण स्वर्गवासी हो गये और आगमों का कण्ठस्थीकरण यथावत् नहीं रह पाया। दुर्भिक्ष की समाप्ति पर श्रमणों को श्रुत के संरक्षण की चिंता हुई। उस समय आचार्य स्कन्दिल युगप्रधान थे। उनके नेतृत्व में मथुरा में के आगम वाचना का आयोजन हुआ। श्रमण संघ एकत्रित हुआ। इस सम्मेलन में मधुमित्र, संघहस्ति प्रभृति आदि १५० श्रमण उपस्थित थे, परन्तु आचार्य स्कन्दिल ही समस्त श्रुतानुयोग को अंकुरित करने में महामेघ के समान यानी इष्ट वस्तु के प्रदाता थे। जिसको भी जो भी श्रुत याद था उसके आधार पर पुनः संकलन किया गया और उसे व्यवस्थित रूप दिया गया। यह वाचना मथुरा में हुई, अतः इसे माधुरी वाचना कहा जाता है अथवा आर्य स्कन्दिल के नेतृत्व में होने के कारण इसे ‘स्कन्दिली वाचना’ के नाम से भी जाना जाता है।
चतुर्थं वाचना
चतुर्थ वाचना, तृतीय वाचना के समकालीन समय में ही हुई। जिस समय उत्तर-पूर्व और मध्य भरतक्षेत्र में विचरण करने वाले मुनि-संघ मुथरा में एकत्रित हुए, उसी समय दक्षिण-पश्चिम में विचरण करने वाले मुनि-संघ वल्लभीपुर, सौराष्ट्र में आर्य नागार्जुन के नेतृत्व में एकत्रित हुए। उस समय वहाँ आर्य नागार्जुन के नेतृत्व में एक मुनि सम्मेलन आयोजित हुआ और विस्मृत श्रुत को व्यवस्थित रूप दिया गया। नागार्जुनाचार्य के नेतृत्व में होने के कारण इसे ‘नागार्जुनीय वाचना’ कहते है। वल्लभीपुर में संपन्न होने के कारण इसे ‘वल्लभी वाचना’ के नाम से भी जाना जाता है। इस वाचना का उल्लेख भद्रेश्वरसूरि रचित कहावली ग्रंथ में मिलता है। आचार्य देववाचक ने भी नागार्जुन की स्तुति की है, जो इस वाचना के महत्व को प्रमाणित करता है।
पंचम वाचना
माथुरी और वल्लभी वाचना के 158 वर्ष पश्चात् यानी वीर निर्वाण के 980वें वर्ष में वल्लभीपुर में पुनः उस युग के महान् आचार्य देवर्द्धिगणीक्षमाश्रमण के नेतृत्व में पाँचवी वाचना आयोजित हुई। आर्य देवर्द्धिगणी समयज्ञ थे। उन्होंने देखा, अनुभव किया कि अब समय बदल रहा है। स्मरणशक्ति दिन-प्रतिदिन क्षीण होती जा रही है। समय रहते यदि श्रुत की सुरक्षा का उपाय नहीं खोजा गया तो उसे बचा पाना कठिन होगा। देवर्द्धिगणी ने बहुश्रुत मुनियों तथा श्रमण-संघ को एकत्रित किया। उन्हें जो श्रुत कंठस्थ था, वह उनसे सुना और लिपिबद्ध कर लिया। आगम साहित्य को स्थायित्व देने की दृष्टि से उनके निर्देशन में आगम लेखन का कार्य प्रारंभ हुआ। उस समय माथुरी और वल्लभी दोनों ही वाचनाएँ उनके समक्ष थी। दोनों परंपराओं के प्रतिनिधि आचार्य एवं मुनिजन भी वहाँ उपस्थित थे। देवर्द्धिगणी ने माथुरी वाचना को प्रमुखता प्रदान की और वल्लभी वाचना को पाठान्तर के रूप में स्वीकार किया। माथुरी वाचना के समय भी आगम ताडपत्रों पर लिखे गये थे। उन्हें सुव्यवस्थित करने का काम देवर्द्धिगणी ने किया।
आगम वाचनाओं का महत्व
इन आगम वाचनाओं ने न केवल जैन धर्म के विशुद्ध ज्ञान को संरक्षित किया, बल्कि इन्हें लिपिबद्ध करने के माध्यम से एक स्थायित्व रूप भी प्रदान किया। इन वाचनाओं के बाद जैन धर्म का ज्ञान एक स्थिर रूप में प्रकट हुआ, जिसे आज हम आगम ग्रंथों के रूप में जानते हैं। प्रत्येक वाचना ने उस समय की आवश्यकता के अनुसार आगमों की संकलन प्रक्रिया को आगे बढ़ाया और जैन धर्म के सिद्धांतों को भविष्य के लिए सुरक्षित किया।
Vāyaṇā serves as a space for seekers, scholars, and practitioners to delve into the depths of Jain studies and rediscover its
relevance in the modern world.
Developed by Universal Software Ahmedabad
Copyright
2025 Vayana is Powered by Premeyamandir.
