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Ancient Jain monk teaching disciples in a spiritual discourse, surrounded by monks and lay followers in a traditional learning hall.

वायना

जब तक लेखन परंपरा का विकास नहीं हुआ था तब तक ज्ञान का एक मुख्य आधार था वाचना (वायणा) और श्रवण (सुनना)। शिष्य अपने गुरु से वाचना लेकर उसे ग्रहण करके कंठस्थ करते थे। इस प्रकार वाचन और श्रवण परंपरा पर आधारित क्रम को “वाचना-परंपरा” कहा जाता है।
भगवान महावीर के निर्वाण के बाद उनके उपदेश मौखिक परंपरा से संरक्षित रहे। भगवान महावीर स्वामी के उपदेशों को उनके गणधर शिष्यों ने सूत्र रूप में गूंथा और वह गूंथा हुआ ज्ञान उन्होनें सूत्र और अर्थ रूप से अपने शिष्यों को वाचना के द्वारा प्रदान किया। वाचना की यह परंपरा बहुत लम्बे समय तक चलती रही। आचार्य भद्रबाहुस्वामी के पश्चात् श्रुत की धारा क्षीण होने लगी।

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Vāyaṇā presents 'पुच्छणा'—an educational initiative promoting inquiry, with students engaging in learning guided by a teacher.